हिन्दी समाचार : धरमजयगढ़
जिस प्रकार मेंढ़क साल भर जमीन के नीचे दुबके पड़े रहते हैं और जैसे ही मानसून सीजन आता है पानी गिरता है ये मेंढ़क टर-टर करते इधर उधर उछल-कूद कर चिल्लाने लगते हैं ठीक इसी तरह मेंढ़क रूपी स्वयंभू अपने आप को पर्यावरण का ज्ञाता और ग्रामीणों का हितैषी कहने वाले कुछ चिन्हांकित लोगों को समझने की आवश्यकता है। ग्रामीणों को इनके पहले का बेग्राउण्ड जानना चाहिए। ये जितने गांव के बाहरी लोग वर्तमान में गांव के हितैषी रक्षक बनकर गांव वालों को उलझा रहें हैं वास्तव में ये कोई गांव वालों के हितैषी नहीं है ना ही किसी प्रकार के ये बुद्धिजीवी वर्ग से हैं वास्तव में यह इनका धंधा है। इनकी उत्पत्ति कहां से हुई यह जानकारी बहुत जरूरी है वास्तव में ये सभी जिंदल कंपनी के पैदावार है जो जिंदल कंपनी के आने के बाद खर-पतवार की तरह कंपनी विरोधी बनकर अपना और अपने घर परिवार को पाल रहे हैं।
कहा से आते हैं ऐसे लोग ?
क्या रायगढ़ रायपुर से आकर विरोध प्रदर्शन करने वाले स्वयंभू विद्वानों ने आज तक किसी भी उद्योग या खदानों को निरस्त या बंद करवाया है तो जवाब मिलेगा नहीं, तो फिर क्या हुआ इनके विरोध से तो जवाब मिलेगा की कुछ समय के लिए प्रक्रिया रोक दिया गया न्यायालय को आधार बनाकर कानूनी रोक-टोक के आधार पर बस इस बिच इनकी कंपनियों के बीच पूछ-परख बढ़ जाती है और इनके निवाला का ध्यान रखकर कुछ बोटियां की व्यवस्था कर दिया जाता है जैसे कि अभी हाल ही में आपको देखने को मिल गया है जो शुरू में कुछ लोग गांव वालों के हितैषी रक्षक बनकर बयानबाजी कर रहे थे वो चुप हो गए हैं कैसे? कंपनी के विरोध में मोबाइल फोन कैमरा घुमाते हुए दिखाई देते हैं इनमें से एक बहुत चर्चित रहते हैं जिनका काम कभी प्रभावित के नाम पर मुआवजा में दलाली, कभी डी.बी.पावर, बालको में किसानों की जमीन वापसी के नाम पर दलाली और तो कभी भारतमाला रोड के मुआवजा बढ़ाने के नाम पर दलाली और वर्तमान में भी वो यह सोचकर विरोध प्रदर्शन करने गांव पहुंच रहे हैं कि किसी तरह अंबुजा सीमेंट कोल ब्लॉक वालों से सैटिंग हो जाये। कभी राज्य परिवहन निगम में कन्डेक्टरी कर अपना जीवन चलाने वाले एक और स्वयंभू चिंतक है जो बाहरी फंडिंग पर अपना विरोध दर्ज कराने हर जनसुनवाई में पहुंच जाते हैं मूलत: यहां के निवासी नहीं है और यहां के लोग जमीन और पर्यावरण पर बड़े-बड़े भाषण दिया करते हैं और झोला लटकाकर घूमते रहते गारे, पेलमा जिंदल के खदानों के खिलाफ जहर उगल कर, कभी स्वयं गांव वालों की कंपनी बनाई और ग्रामीणों को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए कि अब हम अपना कोयला स्वयं निकाल कर जिंदल के बराबर बैठेंगे इन्होंने ने पीछले 15 वर्ष से मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाए और कोयला आंदोलन के नाम पर फंडिंग प्राप्त कर ऐसों आराम कर रहा है लेकिन इनके आका के स्वर्ग सिधारने पर अब यह दुसरे गांव वालों को बहकाने निकल पड़े है। लच्छेदार भाषणों में माहिर ये रायगढ़ विधानसभा से विधायक का चुनाव भी लड़ते हैं लेकिन इन स्वयंभू जमीनी नेता जी की जमानत भी जब्त हो जाती है।
क्या है सच्चाई पुरूंगा कोल ब्लॉक उत्खनन मामले की?
इस अंडरग्राउंड कोयला खदान में तीन गांवों की सीमा आ रही है जिसमें कोकदार, सामरसिंघा और पुरुंगा गांव आ रहा है कंपनी द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार यह कामर्शियल माइनिंग के लिए है कंपनी अपने सीमेंट प्लांट के अलावा अन्य कंपनियों को भी यहां से कोयला विक्रय कर सकेगा। यहां किसी प्रकार का भू-अर्जन नहीं किया जायेगा तो विस्थापन और मुआवजे की तो बात ही नहीं रही बात कंपनी को अपनी जरूरतों के लिए जो भूमि चाहिए वो लगभग 50 एकड़ वो वन भूमि होगा। जीव जन्तु की बात तो जब जंगल उजाड़ा ही नहीं जायेगा तो जीव जन्तुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हां अंडरग्राउंड माइनिंग पर थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ेगा तो वह है कृषि भूमि के जल पर, पर यह भी तब जब उस भूमि के नीचे माइनिंग होगा जो आने वाले 25 वर्ष तक नहीं हो सकता क्योंकि यहां जो सकल भंडार है 383 मिलियन टन है और खनन योग्य 177 मिलियन टन और जबकि अनुमति मात्र 94 मिलियन टन वो भी 46 वर्षों में 2.25 मिलियन टन प्रति वर्ष की दर से। यह भूमिगत खदान है यहां कोई आर आर पालिसी लागू नहीं है। साथ ही कुछ अल्पबुद्धि वाले नेताओं द्वारा जो लोगों को भड़काया जा रहा है कि लात, छाल खदान जैसे मिट्टी का पहाड़ बनेगा और पूरे गांव में धूल मिट्टी प्रदुषण होगा यह सब भ्रामक है क्योंकि यहां भूमि गत खदान में कोई मिटटी का ढेर नहीं होता है।
अंतिम सत्य और परिणाम
इस भूमिगत कोयला खदान के जनसुनवाई तक अधिकांश विरोधी सैट होकर चुप बैठ जायेंगे और गांव वालों को स्वयं संघर्ष कर अपना जीवन यापन इस माहौल में ढल कर करना होगा। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से कुछ लोगों को रोजगार मिलेगा और गांव में चिकित्सा, शिक्षा हेतु व्यवस्था कंपनी की ओर से कर दिया जाएगा।








